" मन की बात " गंधर्वराज विश्ववसु की पुत्री मदालसा तपस्वी और विद्वान थीं। वह अपने पुत्रों को शास्त्रों के उदाहरण देकर बताया करतीं थीं कि शरीर क्षणभंगुर है, आत्म तत्व ही सबकुछ है। सांसारिक मोहजाल में फसकर जीवन व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। मदालसा के पति ऋतध्वज ने एक दिन कहा, प्रिये, तुम तीनों बच्चों को ज्ञानोपदेश देकर सांसारिक जगत से विरत कर चुकी हो। चौथे पुत्र अलर्क को राजधर्म का उपदेश दो, ताकि वह हमारे वंश को आगे बढ़ा सके। मदालसा ने अलर्क को आदर्श राजधर्म की शिक्षा देनी शुरू की। एक दिन मदालसा ने कहा, पुत्र, हम पशु- पक्षियों के जीवन से कुछ सीख सकते हैं। कौवे से आलस्य रहित रहने की शिक्षा ली जा सकती है। भौरों से रसग्राही और मृग से सदा चौकन्ना रहने की सीख लेनी चाहिए। जैसे सर्प फन फैलाकर अपनी रक्षा के लिए दूसरों को डराता है, उसी प्रकार राजा को शत्रु को डराकर आतंकित रखना चाहिए। राजा को हंस के समान नीर- क्षीर विवेकी होना चाहिए। जैसे चंद्रमा और सूर्य सर्वत्र समान रुप से अपनी ऊर्जा का प्रसार करते हैं, वैसे राजा को समस्त प्रजा के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। वही राजा अमर होता है, जो प्रजा के हित और कल्याण को सर्वोपरि मानता है। " जयश्रीकृष्णा, " शुभ प्रभातम्, ==========1743========